पाठ्यक्रम: जीएस-3/आंतरिक सुरक्षा
सन्दर्भ
- केंद्रीय गृह मंत्री ने घुसपैठ के खिलाफ कड़े कदम उठाने का निर्देश देते हुए पुलिस प्रमुखों से अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें निर्वासित करने को कहा।
भारत में अवैध प्रवासी
- पिछली तीन जनगणनाओं के अनुसार, भारत में जन्मे बांग्लादेशी मूल के लोगों में से लगभग 94% लोग पाँच सीमावर्ती राज्यों यथा; पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम में रहते थे।
- भारत और बांग्लादेश के बीच 4,096.7 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो हाल तक अधिकांशतः खुली और असुरक्षित (Porous) थी।
- वर्ष 2025 में गृह मंत्रालय ने बताया कि भारत-बांग्लादेश सीमा के 3,232 किलोमीटर हिस्से पर बाड़ लगाई जा चुकी थी।
भारत में शरणार्थी संकट
1. अफगान शरणार्थी
- अफगानिस्तान में तालिबान के पुनः उभरने के बाद सुरक्षा और शरण की तलाश में अफगान शरणार्थियों का भारत में आगमन बढ़ा है। इनमें से कई सिख और हिंदू हैं, जिन्हें धार्मिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।
2. बांग्लादेशी प्रवासी
- ऐतिहासिक रूप से लोग आर्थिक कारणों से बांग्लादेश से भारत आए हैं। इनमें से बड़ी संख्या पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में बस गई है।
3. रोहिंग्या संकट
- म्यांमार के रखाइन राज्य में जातीय हिंसा और उत्पीड़न के कारण रोहिंग्या मुसलमानों ने भारत में शरण ली है।
- भारत उनके दर्जे के प्रश्न से जूझ रहा है और सरकार ने उनके निर्वासन के संबंध में कड़ा रुख अपनाया है।
4. तिब्बती शरणार्थी
- 1959 में चीन के शासन के विरुद्ध तिब्बती विद्रोह के बाद से तिब्बती भारत में रह रहे हैं।
- उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया गया है और वे मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में स्थित बस्तियों में रहते हैं।
5. श्रीलंकाई शरणार्थी
- श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों के मामले में, उनमें से बड़ी संख्या तमिलनाडु के शिविरों में रहती है। राज्य सरकार उन्हें भत्ता प्रदान करती है, नौकरी करने की अनुमति देती है तथा उनके बच्चों को स्कूल जाने की सुविधा देती है।
- वर्ष 2009 में श्रीलंका के गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद भारत ने इस दिशा में स्वैच्छिक प्रत्यावर्तन (Voluntary Repatriation) को प्रोत्साहित किया है, बशर्ते उनके स्वदेश में परिस्थितियाँ सुरक्षित हों।
शरणार्थियों के संबंध में भारत की नीति
- भारत ने अतीत में शरणार्थियों का स्वागत किया है और वर्तमान में लगभग 3,00,000 लोगों को शरणार्थी के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- इनमें तिब्बती, बांग्लादेश के चकमा समुदाय तथा अफगानिस्तान, श्रीलंका आदि से आए शरणार्थी शामिल हैं।
- हालांकि, भारत 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी अभिसमय (UN Refugee Convention) या शरणार्थियों की स्थिति से संबंधित 1967 के प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। भारत में कोई विशिष्ट शरणार्थी नीति या शरणार्थी कानून भी नहीं है।
सभी विदेशी दस्तावेज-विहीन नागरिकों का नियमन निम्नलिखित कानूनों के प्रावधानों के तहत किया जाता है:
- विदेशी अधिनियम, 1946
- विदेशियों का पंजीकरण अधिनियम, 1939
- पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920
- नागरिकता अधिनियम, 1955
गृह मंत्रालय (MHA) के अनुसार, जो विदेशी नागरिक वैध यात्रा दस्तावेजों के बिना भारत में प्रवेश करते हैं, उन्हें अवैध प्रवासी माना जाता है।
शरणार्थियों के संबंध में भारत की नीति के कारण
1. संसाधनों पर दबाव
- शरणार्थियों को आश्रय देने से संसाधनों पर दबाव पड़ता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ बुनियादी ढाँचा पहले से ही सीमित है।
2. सामाजिक एकजुटता
- बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने से सामाजिक एकजुटता प्रभावित हो सकती है और मेजबान समुदायों के साथ तनाव उत्पन्न होने की संभावना रहती है।
3. सुरक्षा संबंधी चिंताएँ
- शरणार्थियों के आगमन से सुरक्षा संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इनमें चरमपंथी तत्वों की संभावित घुसपैठ तथा खुली और असुरक्षित सीमाओं के कारण लोगों की आवाजाही पर निगरानी रखने की चुनौतियाँ शामिल हैं।
4. राजनयिक संबंध
- शरणार्थियों को आश्रय देने से पड़ोसी देशों या उनके मूल देशों के साथ भारत के राजनयिक संबंधों पर दबाव पड़ सकता है।
5. आर्थिक प्रभाव
- शरणार्थी कम-कुशल रोजगार के लिए स्थानीय श्रमिकों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, जिससे स्थानीय रोजगार बाजार प्रभावित हो सकता है। वहीं, उद्यमिता या श्रम के माध्यम से अर्थव्यवस्था में उनके संभावित योगदान का पूरा लाभ हमेशा नहीं मिल पाता।
निष्कर्ष
- शरणार्थियों के प्रति भारत का दृष्टिकोण मानवीय परंपरा, क्षेत्रीय भू-राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं से प्रभावित रहा है।
- भारत 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी अभिसमय या उसके 1967 के प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, फिर भी उसने ऐतिहासिक रूप से विभिन्न विस्थापित समुदायों को शरण प्रदान की है।
- जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर विस्थापन बढ़ रहा है, भारत के लिए एक स्पष्ट और सुसंगत राष्ट्रीय शरणार्थी नीति विकसित करने की आवश्यकता बढ़ती जा रही है, जो मानवीय दायित्वों के साथ सुरक्षा और जनसांख्यिकीय चिंताओं के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
स्रोत: TH
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